जगह-जगह माता का पंडाल लगा था, भण्डारा खिलाये जा रहे थे, मेला लगा हुआ था, लोगों ने उपवास रखा था, रावण के पुतले जलाये जा रहे थे । ये सभी कार्य लोग एकजुट होकर पूरी लगन और श्रद्धा के साथ कर रहे थे।बुराई पर अच्छाई की जीत, इस दिन लोग अपने अन्दर के रावण यानी की बुराई का नाश करते है... आदि-आदि दशहरा त्यौहार का मुख्य सन्देश है।
दशहरा त्यौहार के अगले दिन ही समाचार पत्र में नाबालिग से बलात्कार,हत्या,चोरी आदि जैसी घटनाएँ दोहराई जाने लगी।
जरा सोचिये....
हमने वो सभी कार्य किये जिसे हम सभी आस्था मानते है।जैसे लोगों ने नौ दिन का व्रत रखा, कन्या पूजन, माता का पंडाल बनाया, मूर्ति विसर्जन, भण्डारा खिलाया, रावण का पुतला जलाया, परिवार के साथ मेला घूमने गए, माता के दर्शन के लिए अलग-अलग मंदिरों में गए । आदि-आदि...।
लेकिन प्रत्येक त्यौहार का एक विशेष सन्देश होता है । हमारी अज्ञानता है की हम उस विशेष सन्देश को छोड़ / नज़रंदाज़ कर बाकी सभी औपचारिकताओं को पूरी लगन और श्रद्धा के साथ पूर्ण करते है।त्यौहार का जो मुख्य सन्देश है अगर उसका पालन नही किया तो ये आस्था मात्र एक ढोंग है। जिसे भगवान कभी स्वीकार नही करेंगे क्योंकि ईश्वर ने जितने भी कार्य किये सभी मानव जाति को सुमार्ग पर चलने की शिक्षा देने के लिए किये...... भगवान श्री राम जी ने रावण का वध कर हमें अपने अहंकार को त्यागने का सन्देश दिया। अन्य त्यौहार सन्देश देते है की ईश्वर सभी इंसानों में है, देवी देवातों की मूर्ति पूजन से पहले अपने माता-पिता का आदर व सम्मान करो। लेकिन कुछ लोग पंडाल तो बहुत भव्य और श्रद्धा से बनाते है और उनकी स्वयं की माँ वृद्धा आश्रम में रहती है।
कहीं त्यौहार एक औपचारिकता बन कर तो नही रह गया है या जाने-अनजाने में हम सब केवल आस्था या औपचारिकता में फँस कर तो नही रह गए ?
जरा सोचिये...!
*इस लेख का मकसद किसी की आस्था को ठेस पहुँचाना कत्तई नही है।
Team Udan
Harshit M.Tripathi
उड़ान,द रियल स्टोरी शो@जरा सोचिये
