ग़ज़ल
बंट रही थी मोहब्बत मुनाफे के सौदे में,
मैं वहां नफ़रत के बीज बोता निकला,
फरिश्तों के सामने रख दिया आइना मैंने,
उनके रूह का क़द थोड़ा छोटा निकला,
यारों ने दिया था तोहफे में जो सिक्का मुझे,
खर्च करने गया तो सिक्का खोटा निकला,
जो शुरू हुआ था करोड़ों की भीड़ के साथ,
वो सफ़र पूरा हुआ तो मैं ही इकलौता निकला,
शराब से करता रहा उम्र भर नफरत मैं,
जनाज़ा मेरा मयखाने से होता निकला।
विभाकर मिश्रा
फरीदाबाद, हरियाणा
Team Udan
उड़ान,द रियल स्टोरी शो @ मैं भी कलाकार@ मैं भी राइटर
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